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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : तय समय में आरोप पत्र दाखिल न होने पर जमानत पाने का हक अपरिहार्य

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि 90 या 60 दिन की तय अवधि में अगर आरोप पत्र दायर नहीं किया गया हो तो आरोपी को सीआरपीसी की धारा 167 (2) के तहत बाध्यकारी (डिफॉल्ट) जमानत पाने का अपरिहार्य अधिकार है। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान ने इस अहम नजीर के साथ दुष्कर्म केस के आरोपी की सशर्त जमानत मंजूर कर रिहा करने का आदेश ट्रायल कोर्ट को दिया है।

आरोपी वरुण तिवारी के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म समेत पाक्सो अधिनियम के तहत आरोप हैं। आरोपी को बीती 14 जनवरी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था। आरोपी के वकील का कहना था कि यह एक ऐसा मामला है जिसमें जांच 90 दिनों की अवधि के भीतर पूरी नहीं हो पाई और धारा 167 सीआरपीसी के तहत उपरोक्त अवधि के भीतर आरोप पत्र दायर न किए जाने पर जमानत दी जानी चाहिए थी। ट्रायल कोर्ट में आरोपी की डिफॉल्ट जमानत की मांग की गई लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए इसे देने से इनकार कर दिया कि यह विशेष पॉक्सो कोर्ट का मामला है इसलिए कोर्ट जमानत नहीं दे सकती।

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बाद में विशेष पॉक्सो अदालत ने भी यह कहते हुए आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया कि उसके समक्ष आवेदन दाखिल करने से पहले और निचली अदालत के समक्ष जमानत अर्जी दाखिल करने के बाद आरोप पत्र दाखिल कर दिया गया है। इस दलील के साथ याचिका दायर कर आरोपी को डिफाल्ट जमानत पर रिहा करने के निर्देश ट्रायल कोर्ट को देने की गुजारिश की गई थी।

कोर्ट ने याचिका मंजूर कर कई नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष ने निर्धारित अवधि के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं किया है तो ऐसे में धारा 167 (2) के तहत आरोपियों के डिफॉल्ट जमानत के अधिकार को मान्यता दी गई है। उधर, राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया।